नज़्म
तेरी यादों से गीले हैं मेरी ख़्वाब
धुप का आना मुनासिब सा नहीं लगता|
यूँ ही लम्हा दर लम्हा
तेरी परछाइयों में है दिन गुज़रता ।
गाँठ तेरी-मेरी खुल गयी है
बंध जाए फिर इसका भरोसा नहीं लगता |
तू मेरी ज़िन्दगी की हसीन उम्र है
अब मुझे बूढा होने का जी नहीं करता ।
सर मेरा महसूस करता है
तेरी हाथों का आशियाँ
मुझे मकान ढूँढने का जी नहीं करता ।
तू तस्वीर में जा बैठा है मुझसे रुसवा हो
बेतस्वीर लोगों से बात करने का जी नहीं करता |
दूब सी पनपती है दिन-दिन तेरी खुशबू ज़हन में
मुझे किसी फूल को छूने का दिल नहीं करता |
कहता है ज़माना दूर है तू
मुझे उनकी मासूमियत पे रोने का जी नहीं करता ।
-विजया कांडपाल
