Monday, August 19, 2013

तुम्हारे लिए
(गुलज़ार साब के जन्मदिन पर)

तुम्हारी बसंती कवितायेँ
और पतझड़  सी नज्में
चूमती हैं मेरी अकेली सुबह
और अकेली शामें

एक कप चाय पीते हैं रोज़ अकेलेपन में
डूबे डूबे से हम
और फिर शोर भरी सड़कों पर
धीमी कर लेते हैं आवाज़


सफ़ेद कलम होगी तुम्हारी शायद
और स्याही का रंग ढूंढ नहीं पायी मैं
अब तक
उस चश्मे के पार दो आँखें कितने मेगापिक्सेल
कैमरे से देखती हैं ?
दफन सांस लेते लोग और ठंडी सफ़ेद चादरों पर
पनपता प्रेम
बेनाम फूलों सी तुम्हारी कवितायेँ मेहेकती  हैं
मिट्टी  सी
तुम गा लेते हो उन सब दिलों को जो
दिल की मेज़ पर सजाये रहते हैं यादों के फ्रेम
पढ़ लेते हो उन्हें मीलों दूर बैठे
और उकेर देते हो उनकी कहानी
आसमान पर, पानी में, गीली हंसी में
गुलज़ार।

इस खोते -खॊते पल में मैं
तुम्हारे शब्दों को छू लेती हूँ
और छू  लेती हूँ ज़िन्दगी
तोहफे में सोचती हूँ
दे दूँ आज
चमकीले पत्तों की नमी
गीली आँखों के फुरसत से भरे पल
प्रेम की बेदमी
और कई सारे हाथ, आँखें
एहसास और दर्दों का पुलिंदा ।
मुझे यकीन है के तुम्हारी
दिल की डायरी मुस्करा जाएगी
और परदे के पीछे से कहेगी
'शाम से आँख में नमी सी है'

-विजया कांडपाल




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