Monday, May 20, 2013

मेरी कलम से


धानों की बालियाँ

चमकती धान की बालियाँ
जब बनेंगी हमारी दीवारें
और फूस बिछ जाएगी
हमारी संवेदनाओं को सँभालने के लिए
तब चाँद का पर्दा हटाकर
सूरज झांकेगा
पढने के लिए श्रृंगार ।


तुम्हारी संवेदनाएं उतर पड़ेंगी नसों में मेरी
और हम बन उठेंगे
जब तुम तरशोगे अपनी सी कोई
देह पर मेरी उँगलियों से अपनी
तब में गढ़ुंगी तुम में खुद को

निष्पाप से, निश्छल  मन लिए
अपनी पवित्र आत्माओं  में समाहित होते
एक दूसरे  में खुद को पिरोते
क्षण क्षण, सांस -सांस


मैं बुनुंगी तुम्हारे लिए होंठों से एक प्रेम का बिछोना
और तुम फूँक दोगे स्वरचित प्रेम राग
आत्मा में मेरी।


-Ⓒविजया

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