Wednesday, September 4, 2013
Titliyaan (तितलियाँ): Poesie
Titliyaan (तितलियाँ): Poesie: Love Senyru Hold Geeta closest my cuticles feel yours He emerges with crimson numbers on facebook I call he says, 'hell...
Tuesday, August 20, 2013
नज़्म
तेरी यादों से गीले हैं मेरी ख़्वाब
धुप का आना मुनासिब सा नहीं लगता|
यूँ ही लम्हा दर लम्हा
तेरी परछाइयों में है दिन गुज़रता ।
गाँठ तेरी-मेरी खुल गयी है
बंध जाए फिर इसका भरोसा नहीं लगता |
तू मेरी ज़िन्दगी की हसीन उम्र है
अब मुझे बूढा होने का जी नहीं करता ।
सर मेरा महसूस करता है
तेरी हाथों का आशियाँ
मुझे मकान ढूँढने का जी नहीं करता ।
तू तस्वीर में जा बैठा है मुझसे रुसवा हो
बेतस्वीर लोगों से बात करने का जी नहीं करता |
दूब सी पनपती है दिन-दिन तेरी खुशबू ज़हन में
मुझे किसी फूल को छूने का दिल नहीं करता |
कहता है ज़माना दूर है तू
मुझे उनकी मासूमियत पे रोने का जी नहीं करता ।
-विजया कांडपाल
Monday, August 19, 2013
तुम्हारे लिए
(गुलज़ार साब के जन्मदिन पर)
तुम्हारी बसंती कवितायेँ
और पतझड़ सी नज्में
चूमती हैं मेरी अकेली सुबह
और अकेली शामें
एक कप चाय पीते हैं रोज़ अकेलेपन में
डूबे डूबे से हम
और फिर शोर भरी सड़कों पर
धीमी कर लेते हैं आवाज़
सफ़ेद कलम होगी तुम्हारी शायद
और स्याही का रंग ढूंढ नहीं पायी मैं
अब तक
उस चश्मे के पार दो आँखें कितने मेगापिक्सेल
कैमरे से देखती हैं ?
दफन सांस लेते लोग और ठंडी सफ़ेद चादरों पर
पनपता प्रेम
बेनाम फूलों सी तुम्हारी कवितायेँ मेहेकती हैं
मिट्टी सी
तुम गा लेते हो उन सब दिलों को जो
दिल की मेज़ पर सजाये रहते हैं यादों के फ्रेम
पढ़ लेते हो उन्हें मीलों दूर बैठे
और उकेर देते हो उनकी कहानी
आसमान पर, पानी में, गीली हंसी में
गुलज़ार।
इस खोते -खॊते पल में मैं
तुम्हारे शब्दों को छू लेती हूँ
और छू लेती हूँ ज़िन्दगी
तोहफे में सोचती हूँ
दे दूँ आज
चमकीले पत्तों की नमी
गीली आँखों के फुरसत से भरे पल
प्रेम की बेदमी
और कई सारे हाथ, आँखें
एहसास और दर्दों का पुलिंदा ।
मुझे यकीन है के तुम्हारी
दिल की डायरी मुस्करा जाएगी
और परदे के पीछे से कहेगी
'शाम से आँख में नमी सी है'
-विजया कांडपाल
(गुलज़ार साब के जन्मदिन पर)
तुम्हारी बसंती कवितायेँ
और पतझड़ सी नज्में
चूमती हैं मेरी अकेली सुबह
और अकेली शामें
एक कप चाय पीते हैं रोज़ अकेलेपन में
डूबे डूबे से हम
और फिर शोर भरी सड़कों पर
धीमी कर लेते हैं आवाज़
सफ़ेद कलम होगी तुम्हारी शायद
और स्याही का रंग ढूंढ नहीं पायी मैं
अब तक
उस चश्मे के पार दो आँखें कितने मेगापिक्सेल
कैमरे से देखती हैं ?
दफन सांस लेते लोग और ठंडी सफ़ेद चादरों पर
पनपता प्रेम
बेनाम फूलों सी तुम्हारी कवितायेँ मेहेकती हैं
मिट्टी सी
तुम गा लेते हो उन सब दिलों को जो
दिल की मेज़ पर सजाये रहते हैं यादों के फ्रेम
पढ़ लेते हो उन्हें मीलों दूर बैठे
और उकेर देते हो उनकी कहानी
आसमान पर, पानी में, गीली हंसी में
गुलज़ार।
इस खोते -खॊते पल में मैं
तुम्हारे शब्दों को छू लेती हूँ
और छू लेती हूँ ज़िन्दगी
तोहफे में सोचती हूँ
दे दूँ आज
चमकीले पत्तों की नमी
गीली आँखों के फुरसत से भरे पल
प्रेम की बेदमी
और कई सारे हाथ, आँखें
एहसास और दर्दों का पुलिंदा ।
मुझे यकीन है के तुम्हारी
दिल की डायरी मुस्करा जाएगी
और परदे के पीछे से कहेगी
'शाम से आँख में नमी सी है'
-विजया कांडपाल
Monday, May 20, 2013
मेरी कलम से
धानों की बालियाँ
चमकती धान की बालियाँ
जब बनेंगी हमारी दीवारें
और फूस बिछ जाएगी
हमारी संवेदनाओं को सँभालने के लिए
तब चाँद का पर्दा हटाकर
सूरज झांकेगा
पढने के लिए श्रृंगार ।
तुम्हारी संवेदनाएं उतर पड़ेंगी नसों में मेरी
और हम बन उठेंगे
जब तुम तरशोगे अपनी सी कोई
देह पर मेरी उँगलियों से अपनी
तब में गढ़ुंगी तुम में खुद को
निष्पाप से, निश्छल मन लिए
अपनी पवित्र आत्माओं में समाहित होते
एक दूसरे में खुद को पिरोते
क्षण क्षण, सांस -सांस
मैं बुनुंगी तुम्हारे लिए होंठों से एक प्रेम का बिछोना
और तुम फूँक दोगे स्वरचित प्रेम राग
आत्मा में मेरी।
-Ⓒविजया
मेरी कलम से
काश के तुम आ जाओ
दिल कहता है कि काश तुम आ जाओ
इस कोरी रात में
मेरी तनहाइयों की उबासियाँ बांटने
बांटने कोरे गीत, कोरी थकान
दिल कहता है के तुम आ जाओ
जैसे प्रेम की पहली मुस्कान
आ जाओ बच्चे की पहली किलकारी से
बेमतलब, बेसबब
आ जाओ यूँ ही देखने के
कैसी लगती हूँ में अब ?
कैसे लेती हूँ तुम्हारा नाम ?
पता नहीं कितनी झुर्रियां
हमने बाँट ली हैं साथ?
काश के तुम आ जाओ
देखने के कितने फूल उग आये हैं
उस कच्चे रस्ते पर
जहाँ तुम आना पक्का कर गए थे |
आ जाओ देखने मेरा घर
जहाँ तुम्हारे नाम की कोई चीज़ नहीं
मेरे अलावा |
आओ देखने चमकती रोशनियाँ आँगन में मेरे
और अँधेरे बांटने आ जाओ भीतर नाचते
तुम्हारी पलक जो अब मेरे पसंदीदा रंग की हो गयी होगी
उनमें पढना चाहती हूँ अपनी यादों की नमियां
और वो कई साल जब तुमने मुझे पुकारा होगा
क्या चश्मा पहने हो तुम अब ?
शायद देख पो अब मुझे ठीक से
अब मुझे खाना पकाना अच्छा नहीं लगता
तुम सीख पाए कुछ पकाना ?
जब कभी टेलीफोन खराब हो जाता था
सोचती थी के तुम आ जाओगे।
तुम्हारे ख्याल जैसे गुनगुने पानी में
थक चुके पैर
और यादें है मासिक धर्म सी
अब आ भी जाओ
गुलाब चुन रखे हैं मैंने
पीले
तुम ले जाओ
अपनी हरी वर्दी की जेब पर लगाना
और ले जाओ वो चिट्ठियाँ भी
जो मैंने कई बार भेजीं
पर लौट आयीं |
-Ⓒविजया
दिल कहता है कि काश तुम आ जाओ
इस कोरी रात में
मेरी तनहाइयों की उबासियाँ बांटने
बांटने कोरे गीत, कोरी थकान
दिल कहता है के तुम आ जाओ
जैसे प्रेम की पहली मुस्कान
आ जाओ बच्चे की पहली किलकारी से
बेमतलब, बेसबब
आ जाओ यूँ ही देखने के
कैसी लगती हूँ में अब ?
कैसे लेती हूँ तुम्हारा नाम ?
पता नहीं कितनी झुर्रियां
हमने बाँट ली हैं साथ?
काश के तुम आ जाओ
देखने के कितने फूल उग आये हैं
उस कच्चे रस्ते पर
जहाँ तुम आना पक्का कर गए थे |
आ जाओ देखने मेरा घर
जहाँ तुम्हारे नाम की कोई चीज़ नहीं
मेरे अलावा |
आओ देखने चमकती रोशनियाँ आँगन में मेरे
और अँधेरे बांटने आ जाओ भीतर नाचते
तुम्हारी पलक जो अब मेरे पसंदीदा रंग की हो गयी होगी
उनमें पढना चाहती हूँ अपनी यादों की नमियां
और वो कई साल जब तुमने मुझे पुकारा होगा
क्या चश्मा पहने हो तुम अब ?
शायद देख पो अब मुझे ठीक से
अब मुझे खाना पकाना अच्छा नहीं लगता
तुम सीख पाए कुछ पकाना ?
जब कभी टेलीफोन खराब हो जाता था
सोचती थी के तुम आ जाओगे।
तुम्हारे ख्याल जैसे गुनगुने पानी में
थक चुके पैर
और यादें है मासिक धर्म सी
अब आ भी जाओ
गुलाब चुन रखे हैं मैंने
पीले
तुम ले जाओ
अपनी हरी वर्दी की जेब पर लगाना
और ले जाओ वो चिट्ठियाँ भी
जो मैंने कई बार भेजीं
पर लौट आयीं |
-Ⓒविजया
मेरी कलम से
उनके लिए जो दर्द गाते हैं
(जगजीत जी की याद में )
जैसे इंतज़ार में सफ़ेद-सलेटी
परिंदे
प्यार के दानों के
वैसे ही
बिछ जाते थे लोग
कालीनों पर
महफ़िल में तुम्हारी
तुम्हारी उँगलियों से शुरू होती ग़ज़ल
जब आती थी होंठों तक
लोग सूफी हो जाते थे
किसी सुदूर पहाड़ के नॉन कमर्शियल मंदिर सा एहसास
सा तुम्हारी महफिलों में
Ⓒ विजया
जैसे रिसता है प्रेम धीरे-धीरे दिल में
और फिर दिल ही सोख लेता है उसे आहिस्ता आहिस्ता
वैसे ही सुरों को चूम लेती थीं तुम्हारी सुगन्धित धूप सी आवाज़
चुटकी में हवा होती खुशियाँ नहीं
दर्द गाते तुम
सुरों और ग़ज़लों में पिरोया दर्द
कैसे सीता था ज़ख्म सुनने वालों के ?
तुम्हारे होंठों पर चढ़े सुर का स्वाद
हर जुबां लेती है
लोग बह जाते हैं
तुम्हारी ग़ज़लों की बे साहिल नदियों में
जैसे रात बहती है तनहा सी
शायद यही है मतलब संगीत का
तुम्हारा नाम
शायद तुम्हें ही ग़ज़ल कहते हैं
आज तुम जा चुके हो
पर यादों की गीली मिटटी में
तुम्हारी यादों के गुलाब
महकेंगे हमेशा|
(जगजीत जी की याद में )
जैसे इंतज़ार में सफ़ेद-सलेटी
परिंदे
प्यार के दानों के
वैसे ही
बिछ जाते थे लोग
कालीनों पर
महफ़िल में तुम्हारी
तुम्हारी उँगलियों से शुरू होती ग़ज़ल
जब आती थी होंठों तक
लोग सूफी हो जाते थे
किसी सुदूर पहाड़ के नॉन कमर्शियल मंदिर सा एहसास
सा तुम्हारी महफिलों में
Ⓒ विजया
जैसे रिसता है प्रेम धीरे-धीरे दिल में
और फिर दिल ही सोख लेता है उसे आहिस्ता आहिस्ता
वैसे ही सुरों को चूम लेती थीं तुम्हारी सुगन्धित धूप सी आवाज़
चुटकी में हवा होती खुशियाँ नहीं
दर्द गाते तुम
सुरों और ग़ज़लों में पिरोया दर्द
कैसे सीता था ज़ख्म सुनने वालों के ?
तुम्हारे होंठों पर चढ़े सुर का स्वाद
हर जुबां लेती है
लोग बह जाते हैं
तुम्हारी ग़ज़लों की बे साहिल नदियों में
जैसे रात बहती है तनहा सी
शायद यही है मतलब संगीत का
तुम्हारा नाम
शायद तुम्हें ही ग़ज़ल कहते हैं
आज तुम जा चुके हो
पर यादों की गीली मिटटी में
तुम्हारी यादों के गुलाब
महकेंगे हमेशा|
Thursday, May 16, 2013
विदेशी कलम से : ऊटी मार्गरेट सेन की कुछ कवितायेँ
ऊटी मार्गरेट सेन का परिचय :ऊटी मार्गरेट सेन का जन्म
नूरेमबर्ग जर्मनी में हुआ। फ्रांसीसी और स्पेनी साहित्य में येल
विश्वविध्यालय से डॉक्टरेट करने के बाद वे कैलिफ़ोर्निया, यूनाइटेड स्टेट्स
ऑफ़ अमेरिका आ गयीं।
यहाँ पर उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति को पढाया, विशेषतः स्पेनी भाषा व् साहित्य को। ऊटी ने कई लैटिन अमेरिकन देशों में वक्तव्य दिए हैं।
वे पांच भाषाओँ में कवितायेँ लिखती और अनुवादित करती हैं। वे एक साहित्यिक संपादक भी हैं और उन्होंने साहित्य पर कई आलेख लिखे हैं।
वे 'पेन क्लब काउंटी' की अध्यक्ष रह चुकी हैं और उन्होंने कैदी लेखकों के तरफ से कई पत्र दुनिया भर तक पहुंचाए हैं।
उनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं: बॉडी स्केप्स, वर्ड्स ऑफ़ आर्ट, और तीन चाप बुक जिनमें प्रमुख हैं: रैंडम लाइट-स्पॉट्स ऑफ़ टाइम,
बॉडी एंड पार्ट्स,-कॉर्पो एंड प्रति, अव्क्वार्ड चाइल्ड ( उनके बचपन का युधोतर वृतांत) और फाइव सेंसेस।
ऊटी की रचनायें यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका, कई देशों में और इन्टरनेट पर प्रकाशित हो चुकी हैं।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
साथ
(जॉर्ज सैमुएल के पारस्परिक प्रभाव के सिद्धांत की सहमति में)
रहो साथ मेरे
छेड़ हो या खारिश
खुशबू या ज़ायका
ख़ुशी हो या ग़म
भूख हो या प्यास
बांटो साथ मेरे
दुःख की ख़ुशी
ख़ुशी का दर्द
और मिली जुली मदहोशी
साथ रहो इन सब में
यही है ज़िन्दगी |
नदी के समीप देमोस्थानीज़
समीप नदी के,
देमोस्थनीज|
मुह में पत्थर होते हुए भी
सागर चिल्ला रहा है
और चिल्ला रहे हैं अथेन्स वासी
एरोपैज में
विशाल है सागर इतना
के भूल जाता है
देमोस्थनीज
विषय में अपने
मनाता है वो सागर को
अपनी चर्चा में
सागर संसार है
प्रकृति है सागर
गूँज है यह मानव वाणियों की |
सागर है
ताकि लोग सुन सकें गूँज मानवता की
किसी को तो उन्हें मनाना होगा
बिना चीखे
एरोपैज में|
नदी के तट पर (Translated from ‘Morning in Long Beach’)
एक गिलहरी आनंदित
दौड़ती तेज़ दूसरी से
और खेलतीं दोनों
अपना असभ्य खेल |
पांच गौरियां बैठीं मेज़ के नीचे
मारती चोंच धुल पर |
एक समुद्री पक्षी
अचानक गोते खाता
तरंग लेते पानी में |
चार श्याम पक्षी कालिमा लिए पंखों में
कूदते
लड़खड़ाते एक मित्र के साथ |
बगुला एक झांकता
खड़ा स्त्भ्ध
पानी में झांकता |
और समय उड़ता हुआ |
असज्जित (Translated from ‘Nude Woman Shoulder View’)
(‘Dreams from a School of Chance’ की शीर्षक कविता)
जादू भरा क्षण वो
देखता एक चित्रकार
चित्रित करने के लिए
प्रशंसा भरी आँखों से
देवी सी
माँ को अपनी
लिए है जो दैहिक प्रचुरता |
कल्पना करते हम उस माँ की
भावना भर आनंद से
बार बार मुडती जो बात करने के लिए बेटे से
चित्रित कंधे पर अपने |
जादुई क्षण
एक अदितीय मनोहरता
प्रकाश की किरण
आर- पार होतीं
हमारे मानव जीवनों से|
नेपल्स के एक महल में (Translated from On a Window at Capidomonte Palace, Nepales)
सामग्रियां सभी हैं यहाँ कैनवास की
काढ़ा जाये
रंग जाये
जिसपर
एक सुरम्य भूदृश्य
बादलों सहित |
एक पेड़ हो जिसमें
बंधा जड़ों से
भूमि पर प्रकाश ले
जो देता हो रंगों को |
मेरे गीत (Translated from ‘New Song of Songs’)
एक खूबसूरत फुसफुसाहट के साथ
जीवन में आये तुम
कानों के भीतर कांपती आवाजों-से
पक्षियों के गीत-से
बुलबुले बनाते झरने के पानी-से
सुरम्य सोम्य सागर की आवाज़-से
बांधता है जो धरती को प्रेम सहित |
प्रेम
जैसा मेरा है तुम्हारे लिए |
प्रेम गीत अधरों पर (Translated from ‘Love Word on My Lips’)
प्रेम रोया
मेरे अधरों पर
चुम्बित किया तुमने इसे जागते हुए |
रहो तुम सदैव आकाश से
एक पृथ्वी और कई तारों से
मैं स्वामित्व करती तुम्हारा |
रोशनियाँ पानी में
पुलों के नीचे हिलते बादल
जैसे तुम्हारी आंखें हो हिलतीं भीतर मेरे |
खोलो सागर, खोलो
अपनी आँखें, चौड़ी खिड़कियाँ और दरवाज़े
जब तक तैर न लें हम रौशनी में |
रोतीं हैं आँखें, सिसकती है आवाज़
तैरते हैं हम जैसे ही एक दूसरे के पानी में |
जागती रातों में
तैरते हम तारों ओर मछलियों सहित
प्रकाश की ओर सुबह के
सपनों की उदासी में
सागर, हवा, सूर्य, बादल
देखते हमारा चुम्बन|
लेती हुई मैं अपना बृहत मानचित्रित संसार
तत्त्व फ्लोरिडा के
(हायकू)
(Elements of Florida, ‘Haiku’)
शरीर पानी के
बहते बादलों के साथ प्लेसिड के
भेदते एक दुसरे को |
तत्त्व
पानी और पारदर्शी हवा
बनती रौशनी और झाग |
बहता पानी
खोजता विश्राम
और समानता |
नावें हिलतीं पानी से
नदी निस्थापित करती उसे
एक सोम्य संतुलन से |
खेल, सोम्य स्पर्श
हमारी देह उद्गमित करती
शांत होने पर मस्तिस्क के|
पुस्तक-
एक कला
एक विचार जन्मित
पंखों सहित, तैयार उड़ान के लिए|
लागूना तट (हायकू) (Laguna Beach ‘Haiku)
सफ़ेद और सलेटी
सूर्या की झुकी किरण
हिलती गीली रेत पर
सफ़ेद गोटा फुहार का
हिलता मेजपोश-सा
धरती और समुद्र के बीच
हम कभी जान पाएंगे नहीं
के मछली समुद्र से सुगन्धित है
या समुद्र मछली से
कई क्रीडाओं से अधिक
देता है आराम
खेल मृत्यु का रेत पर
तस्वीर ( Self Portrait)
बैठी वह, लिखती
टनों हायकू
पासपोर्ट पर अपने |
रेत- पुराने प्रेमी सी
कहीं सोम्य
कठोर कहीं |
कूटी गयी टुकड़ों में
रेत-विशाल देह
देती आश्रय मुझे |
रेत
कांपती जैसे दो देहें
प्राचीन खेल के पश्चात् |
तुम करते हो अब मुझे अस्वीकार
करते थे तब प्रेम मेरे दिमाग से
बिना प्रश्न किये |
सूर्य-लाल और भयावह
जलता मेरी पलकों तले
एक भूले, खोये प्रेम की भांति|
मैं बंद करतीं पलकें
सूर्यास्त होता अपराह्न में
तुम्हारे चेहरे का |
नीले द्वीप
धरती और समुद्र के विपरीत
जलाते मेरी पलकें |
नीली आँखें
लाल अब मेरी पलकों तले
खोजतीं प्रेम |
दहाड़ती नदी
सोम्य भी
दो बजे लिए शांत आकाश |
नदी की हवाएं , सांस लेतीं
सांस में बाँट ती जो कई पक्षियों के साथ
सिले हैं जो आकाश से |
धरती का दर्पण
नदी का पिघला हिस्सा
बोलता एक घर के लिए
नदी की दहाड़
भेदती मेरा शरीर
एक गूँज सहित |
अप्रैल की दोपहर (April Afternoon)
मुस्कुराती सूरज की किरणें
शानदार पेड़ की शाख पर
और मैं इस ख़ूबसूरती के बीच |
पत्तियाँ झूलती हवा में
पड़ती पेड़ पर रौशनी
यह जीवन, मोअत्तिल आज
नर्म हवा से
एक तोहफे सा, एक पल में
ज़िन्दगी बनीं मोहब्बत आज |
सबूत और सोच तुम्हारी
मेरा ध्यान
मेरा अमल
हिलता पत्तियों का गुच्छा
अदृश्य ख़ूबसूरती
हवा करती स्पर्श रौशनी को |
यही पल है जब दोपहर मंडराती है
और हवा पंछियों के चारों ओर घूमती है
पत्तियां सरसरातीं, अलग होतीं
और रौशनी डूबती क्षितिज की ओर
सोम्य परछाइयाँ फैलतीं
शाम को
मिर्च के पत्ते
बुने गोटे से लगते
और तुम मन में मेरे हो टहेलते |
यहाँ पर उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति को पढाया, विशेषतः स्पेनी भाषा व् साहित्य को। ऊटी ने कई लैटिन अमेरिकन देशों में वक्तव्य दिए हैं।
वे पांच भाषाओँ में कवितायेँ लिखती और अनुवादित करती हैं। वे एक साहित्यिक संपादक भी हैं और उन्होंने साहित्य पर कई आलेख लिखे हैं।
वे 'पेन क्लब काउंटी' की अध्यक्ष रह चुकी हैं और उन्होंने कैदी लेखकों के तरफ से कई पत्र दुनिया भर तक पहुंचाए हैं।
उनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं: बॉडी स्केप्स, वर्ड्स ऑफ़ आर्ट, और तीन चाप बुक जिनमें प्रमुख हैं: रैंडम लाइट-स्पॉट्स ऑफ़ टाइम,
बॉडी एंड पार्ट्स,-कॉर्पो एंड प्रति, अव्क्वार्ड चाइल्ड ( उनके बचपन का युधोतर वृतांत) और फाइव सेंसेस।
ऊटी की रचनायें यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका, कई देशों में और इन्टरनेट पर प्रकाशित हो चुकी हैं।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
साथ
(जॉर्ज सैमुएल के पारस्परिक प्रभाव के सिद्धांत की सहमति में)
रहो साथ मेरे
छेड़ हो या खारिश
खुशबू या ज़ायका
ख़ुशी हो या ग़म
भूख हो या प्यास
बांटो साथ मेरे
दुःख की ख़ुशी
ख़ुशी का दर्द
और मिली जुली मदहोशी
साथ रहो इन सब में
यही है ज़िन्दगी |
नदी के समीप देमोस्थानीज़
समीप नदी के,
देमोस्थनीज|
लोग सोचते हैं
सीखा है उसने यहाँ
चिल्लानामुह में पत्थर होते हुए भी
सागर चिल्ला रहा है
और चिल्ला रहे हैं अथेन्स वासी
एरोपैज में
विशाल है सागर इतना
के भूल जाता है
देमोस्थनीज
विषय में अपने
मनाता है वो सागर को
अपनी चर्चा में
सागर संसार है
प्रकृति है सागर
गूँज है यह मानव वाणियों की |
सागर है
ताकि लोग सुन सकें गूँज मानवता की
किसी को तो उन्हें मनाना होगा
बिना चीखे
एरोपैज में|
नदी के तट पर (Translated from ‘Morning in Long Beach’)
एक गिलहरी आनंदित
दौड़ती तेज़ दूसरी से
और खेलतीं दोनों
अपना असभ्य खेल |
पांच गौरियां बैठीं मेज़ के नीचे
मारती चोंच धुल पर |
एक समुद्री पक्षी
अचानक गोते खाता
तरंग लेते पानी में |
चार श्याम पक्षी कालिमा लिए पंखों में
कूदते
लड़खड़ाते एक मित्र के साथ |
बगुला एक झांकता
खड़ा स्त्भ्ध
पानी में झांकता |
और समय उड़ता हुआ |
असज्जित (Translated from ‘Nude Woman Shoulder View’)
(‘Dreams from a School of Chance’ की शीर्षक कविता)
जादू भरा क्षण वो
देखता एक चित्रकार
चित्रित करने के लिए
प्रशंसा भरी आँखों से
देवी सी
माँ को अपनी
लिए है जो दैहिक प्रचुरता |
कल्पना करते हम उस माँ की
भावना भर आनंद से
बार बार मुडती जो बात करने के लिए बेटे से
चित्रित कंधे पर अपने |
जादुई क्षण
एक अदितीय मनोहरता
प्रकाश की किरण
आर- पार होतीं
हमारे मानव जीवनों से|
नेपल्स के एक महल में (Translated from On a Window at Capidomonte Palace, Nepales)
सामग्रियां सभी हैं यहाँ कैनवास की
काढ़ा जाये
रंग जाये
जिसपर
एक सुरम्य भूदृश्य
बादलों सहित |
एक पेड़ हो जिसमें
बंधा जड़ों से
भूमि पर प्रकाश ले
जो देता हो रंगों को |
मेरे गीत (Translated from ‘New Song of Songs’)
एक खूबसूरत फुसफुसाहट के साथ
जीवन में आये तुम
कानों के भीतर कांपती आवाजों-से
पक्षियों के गीत-से
बुलबुले बनाते झरने के पानी-से
सुरम्य सोम्य सागर की आवाज़-से
बांधता है जो धरती को प्रेम सहित |
प्रेम
जैसा मेरा है तुम्हारे लिए |
प्रेम गीत अधरों पर (Translated from ‘Love Word on My Lips’)
प्रेम रोया
मेरे अधरों पर
चुम्बित किया तुमने इसे जागते हुए |
रहो तुम सदैव आकाश से
एक पृथ्वी और कई तारों से
मैं स्वामित्व करती तुम्हारा |
रोशनियाँ पानी में
पुलों के नीचे हिलते बादल
जैसे तुम्हारी आंखें हो हिलतीं भीतर मेरे |
खोलो सागर, खोलो
अपनी आँखें, चौड़ी खिड़कियाँ और दरवाज़े
जब तक तैर न लें हम रौशनी में |
रोतीं हैं आँखें, सिसकती है आवाज़
तैरते हैं हम जैसे ही एक दूसरे के पानी में |
जागती रातों में
तैरते हम तारों ओर मछलियों सहित
प्रकाश की ओर सुबह के
सपनों की उदासी में
सागर, हवा, सूर्य, बादल
देखते हमारा चुम्बन|
लो श्रृंगार (Translated from ‘Arts Poetico-
Erotica’)
(तुम्हारी देह सुन्दरता से भरा एक
भूदृश्य………………)
लो यह मार्ग भौतिक सुख के लिए
पकड़ में ले इसका भटका हुआ विस्तार और
धेय्य
इसका बेबाकी से बना पुराना तत्त्व
इसके मानचित्र को
पकड़ो मेरी देह पर
बनो मेरे जैसे मैं हूँ तुम्हारी |
तुम्हें मिलेगा एक रिक्त, स्वच्छ स्थान,
भीतर उसके
एक गुलाब का बगीचा, एक धरती
एक पर्वत और समुद्र भी
कटि से होता हुआ
गुप्त और बंद
सत्य नामक उपद्रवी पशु का |
खोजो तुम क्रीडामय भूगोल वहां
ढका है
जो रोषपूर्ण कोलाहल से
कभी कभी द्वेष भरे भटकाव से
पर गुप्त भली भांति |
करो प्रदर्शित बाध्य छिपा संगीत
रास्ता है यहाँ से
एकदा वर्जित मूल की ओर
आवरण एक सोम्य मुक्त स्थान का |
हमारी सांसे इकठ्ठा करतीं रेतीली देहों
को
तैरती जो अंतिम
अपराजित तट की ओर
बहती रेत इकठ्ठा होती मिट्टी के ढेर में
यह शब्द हमारा संसार हैं
जहाँ मैं हूँ, तुम हो
मूल रूप से
कितना परिपूर्ण है होना तुम्हारे साथ
यहाँ
दो प्रेम स्पर्शित मछलियों-से हम
सुरमई नीले रंग के अब
लेती हुई मैं अपना बृहत मानचित्रित संसार
जो सदैव मेरा था
मूल रूप से मेरा|
शरीर पानी के
बहते बादलों के साथ प्लेसिड के
भेदते एक दुसरे को |
तत्त्व
पानी और पारदर्शी हवा
बनती रौशनी और झाग |
बहता पानी
खोजता विश्राम
और समानता |
नावें हिलतीं पानी से
नदी निस्थापित करती उसे
एक सोम्य संतुलन से |
खेल, सोम्य स्पर्श
हमारी देह उद्गमित करती
शांत होने पर मस्तिस्क के|
पुस्तक-
एक कला
एक विचार जन्मित
पंखों सहित, तैयार उड़ान के लिए|
लागूना तट (हायकू) (Laguna Beach ‘Haiku)
सफ़ेद और सलेटी
सूर्या की झुकी किरण
हिलती गीली रेत पर
सफ़ेद गोटा फुहार का
हिलता मेजपोश-सा
धरती और समुद्र के बीच
हम कभी जान पाएंगे नहीं
के मछली समुद्र से सुगन्धित है
या समुद्र मछली से
कई क्रीडाओं से अधिक
देता है आराम
खेल मृत्यु का रेत पर
तस्वीर ( Self Portrait)
बैठी वह, लिखती
टनों हायकू
पासपोर्ट पर अपने |
रेत- पुराने प्रेमी सी
कहीं सोम्य
कठोर कहीं |
कूटी गयी टुकड़ों में
रेत-विशाल देह
देती आश्रय मुझे |
रेत
कांपती जैसे दो देहें
प्राचीन खेल के पश्चात् |
तुम करते हो अब मुझे अस्वीकार
करते थे तब प्रेम मेरे दिमाग से
बिना प्रश्न किये |
सूर्य-लाल और भयावह
जलता मेरी पलकों तले
एक भूले, खोये प्रेम की भांति|
मैं बंद करतीं पलकें
सूर्यास्त होता अपराह्न में
तुम्हारे चेहरे का |
नीले द्वीप
धरती और समुद्र के विपरीत
जलाते मेरी पलकें |
नीली आँखें
लाल अब मेरी पलकों तले
खोजतीं प्रेम |
दहाड़ती नदी
सोम्य भी
दो बजे लिए शांत आकाश |
नदी की हवाएं , सांस लेतीं
सांस में बाँट ती जो कई पक्षियों के साथ
सिले हैं जो आकाश से |
धरती का दर्पण
नदी का पिघला हिस्सा
बोलता एक घर के लिए
नदी की दहाड़
भेदती मेरा शरीर
एक गूँज सहित |
अप्रैल की दोपहर (April Afternoon)
मुस्कुराती सूरज की किरणें
शानदार पेड़ की शाख पर
और मैं इस ख़ूबसूरती के बीच |
पत्तियाँ झूलती हवा में
पड़ती पेड़ पर रौशनी
यह जीवन, मोअत्तिल आज
नर्म हवा से
एक तोहफे सा, एक पल में
ज़िन्दगी बनीं मोहब्बत आज |
सबूत और सोच तुम्हारी
मेरा ध्यान
मेरा अमल
हिलता पत्तियों का गुच्छा
अदृश्य ख़ूबसूरती
हवा करती स्पर्श रौशनी को |
यही पल है जब दोपहर मंडराती है
और हवा पंछियों के चारों ओर घूमती है
पत्तियां सरसरातीं, अलग होतीं
और रौशनी डूबती क्षितिज की ओर
सोम्य परछाइयाँ फैलतीं
शाम को
मिर्च के पत्ते
बुने गोटे से लगते
और तुम मन में मेरे हो टहेलते |
विदेशी कलम से : सेंटिआगो विलाफानिया की कुछ कवितायेँ
सेंटिआगो की अप्रकाशित कविता संग्रह 'मुर्तामी' का मैंने हिंदी में अनुवादन किया 'प्रेमांजलि' के नाम से। प्रेमांजलि फरवरी में दिल्ली पुस्तक मेला में 2 0 1 3 में बोधि प्रकाशन द्वारा लोकार्पित की गयी|नीचे प्रस्तुत अनुवादित कवितायेँ 'प्रेमांजलि' की कुछ कविताओं में से हैं।
बेपरवाह
मैं बदमाश हूँ
ढूंढो मुझे झुग्गियों में पयाटास की
या फिर लोकल ट्रेन के भीतर
दफना दो मुझे चीथड़ों में
या फिर कागज के कम्बलों में रात को
जब में स्वप्न देखता हूँ एक घर का
अपना कहने के लिए
तैरता हूँ मैं दूषित नदियों में
मनुष्यों के द्वारा गन्दी की गयी
जिनकी आत्माएं पासिंग नदी से भी काली हो गयी हैं
चलता हूँ मैं मनीला की गलियो की
सघन हवा में
धुआं डकारती गाड़ियों से
चट्टानों सी ऊंची
इकठ्ठा करता हूँ गन्दगी
शहर की
शहर जो औजीयां अस्तबलों से भी गन्दा है
बारिश के दिनों में
दिन की रौशनी में यूँ ही चलते हुए
मालों में
देखता हूँ गनिकाएं व्यापार करती देह का
चंद पैसों के लिए
आह!
यह क्या भविष्य देखता हूँ मैं
-संतिअगो विल्लाफनिया की कविता ' फॉर अस हु ड़ू नोट केयर' से अनुवादित
नदी का अंतिम गीत
सुना उस रात मैंने
नदी का अंतिम गीत
नाम रहित प्रेमियों की आहें
चुरातीं एक क्षण
जैसे अनंत काल तक|
एक मुसाफिर पक्षी का
शोक-नाद
विराम चिन्ह लगाता
रात की शांति में|
प्रतीक्षित था मैं
दिन के उठने के लिए
महसूस करता धरा की
धडकनें
और आकाश गंगा का स्पंदन|
एटलस की एक ऊँगली ने
शुरू किये कम्पन
और नदी में सुनामी के
पंख फड फडाने लगे|
मृत्यु आई निरर्थक
बिना चेतावनी के
उनकी ओर, जिन्होंने सुने
स्तोत्र
अचेतन में|
उस रात
मैंने सुना नदी का अंतिम गीत
जाने वालो का शोकनाद|
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सुना उस रात मैंने
नदी का अंतिम गीत
नाम रहित प्रेमियों की आहें
चुरातीं एक क्षण
जैसे अनंत काल तक|
एक मुसाफिर पक्षी का
शोक-नाद
विराम चिन्ह लगाता
रात की शांति में|
प्रतीक्षित था मैं
दिन के उठने के लिए
महसूस करता धरा की
धडकनें
और आकाश गंगा का स्पंदन|
एटलस की एक ऊँगली ने
शुरू किये कम्पन
और नदी में सुनामी के
पंख फड फडाने लगे|
मृत्यु आई निरर्थक
बिना चेतावनी के
उनकी ओर, जिन्होंने सुने
स्तोत्र
अचेतन में|
उस रात
मैंने सुना नदी का अंतिम गीत
जाने वालो का शोकनाद|
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एक विद्रोही कवि के लिए
तुमने स्याही से लिखा एक कटु जीवन
कागज़ लहुलुहान हुआ, जला तुम्हारे रक्त से
और समस्त आंसु बह गए|
अपनी रिक्त आँखों से तुमने अच्छे दिनों की कामना की होगी
लड़ते हुए अदृश्य हो|
सुना मैंने प्रेरक देवियों का रुदन
जब मृत्यु तुम्हें ले गयी सौ-सौ बार
गोलियों ने भेदा तुम्हारा मूंह
और रक्त की अंतिम बूँद रंग गयी ज़मीं
तुम्हारी आखरी कविता के साथ|
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रजनीगंधा
तुम्हारी आँखें,
निम्न बनातीं सुबह के सूर्य को
प्रज्वल्लित है तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरे हृदय में,
तुम्हारा सौंदर्य, हक़दार एक नाम का,
पर मैं तुम्हें क्या दूं?
सिवाय एक गीत के
गीत, जो गा सके मेरे प्रेम को
विश्व के पुनर्निर्मित होने तक
ये रात शांत है, प्रेयसी
और समय जा रहा है धीरे-धीरे
ओंस से चुम्बित शाम की हवा की साँसे हल्की हो रही हैं
बेहद मीठा है यह सपना
के जागना है मुझे तुम्हारे लिए
तुम्हारा कोमल, सजीला चेहरा
हमेशा स्पर्शित मेरे प्रेम से
देखकर इसी चेहरे को
दफ़न ग़म विदा लेता है
रात की ख़ामोशी में
हमेशा याद आते हैं मुझे, तुम्हें भाने वाले
मेरे प्रेम-स्पर्श
तुम्हारी याद है मेरे साथ
मेरे कफ़न तक, प्रेयसी
-सैन्टीएगो विल्लाफानिया कविता ' अ नाईट पीस'
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स्वदेश
मैंने नापा है तुम्हारी सुडौलता को
कभी टकटकी बांधकर कभी एक दृष्टी से यूँ ही
हर उभार और आलेख को
चाहे वो पहाड़ हों या पठार
मैंने जीते हैं
तुम्हारे क्षितिज का परागमन किया है मैंने, एक झपक में
अधीन कर चलाता हुआ चारों दिशाओं को
चौकड़ियाँ भरता हुआ मैं तुम्हारे हरे अस्तबलों में
पार किया है मैंने तुम्हारी नदियों को
उस पुराने पशु की पीठ पर
और गाँव देवियों को तुम्हारे नाम की महत्ता और उदगम के रहस्य बताये हैं
स्मृति भरी है मेरी तुम्हारी लोक एवं पौराणिक कथाओं से
जिन्होंने मिथकीय बनाया है प्रेम प्रसंगों और जीवनियों को
तुम्हारी पीढ़ियों की, जैसे की वे हज़ारों वर्षों पहले लिखी गयी हों
स्वदेश, तुम्हारे पुनर्जागरण और स्वर्ण युग को रंगीन बनाने के लिए
और अदितीय करने के लिए ही
मैंने अब तक अपनी श्वाशों को चलायमान रखा है
ताकि, तुम्हारा इतिहास सुना जाये
मैंने मिथ्या पूर्ण व्यक्तव्य दियें हैं,
अपने ही लोगों के मध्य
जो खोते जा रहे हैं
अपनी जिव्हा का नमक
और अपनी विरासत
तुम मेरी पकड़ में हों कोबोलन (क्षेत्र पंगासिनान के रहिवासी)
मेरी कल्पना के भवन में
मेरे स्वदेश हों तुम
यहीं मेरे हृदय क्षेत्र में
जब स्वर धड़कते हैं जैसे की जंगली कबूतरों की श्वास रोक दी गयी हों
तब ये शब्द मद की भाँती बहते हैं
जैसे रक्त बहता है मेरी धमनियों में
पुनः मुझे सुनने दो बांसों से निकले वो गीत
किसी प्रेमी की श्रृंगार से भरी कवितायेँ
हाँ, पुनः सुनने हैं मुझे वे मंत्र और मंत्रध्वानियाँ
और पहाड़ों पर बैठी निस्तभता को भी
उस कालिमा में विलुप्त होंने से पहले
उस भयावह उड़ान को भरने से पहले
उठो कोबोलन और मेरे शब्दों में से बोलो
अपने शब्दों को अधरों से छु कर उन्हें पुनर्जीवित कर दो
तब तक, जब तक तुम्हारे वंशज उन्हें सुन न लें
सुनो उनके अंतर्मन की भाषा
और बोलो
मेरे विलुप्त होने से पहले
-संतिअगो विल्लाफनिया की कविता “Country of My Own” से अनुवादित
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प्रज्वलित
बज रहा है धानो का गीत आज रात्रि,
और समीप है आखेटक के लिए प्रजवलित चन्द्र
स्नान कर उसकी आभा में प्रदर्शित करते हुए
आदि कालीन नृत्य उस सभा का
जहाँ कृषक अर्पण करता है जो बोया था उसने धरा और रोपण की देवी को
में श्रवण करता हूँ उनकी शांत मंत्रध्वानियाँ और गीतों को
कथा कारों की अंतिम कथा
असंस्कृत आगमन के साथ
ताल में झूमते शून्य बना गतीवर्धित
में देखता हूँ उनकी प्रकाश्पुन्जित एवं जीर्ण काया
और ज्वाला जो अपनी ही श्वासों में विलुप्त हो चुकी है
ये अधार्मिक रिवाज़, आरंभिक आवेश स्पर्श कर जाते हैं मुझे स्मृतियों में
नहीं कोमलता से नहीं
एक कवि की वाणी को जो भीतर है मेरे
यह धनो का गीत जो बज रहा है आज रात्र
दूर नहीं है किसी कृषक के चन्द्र से
आलिंगन में बाँध लेगा ये मेरे पौरुष को
और वे सुनेंगे मुझे चीत्कारते हुए मेरी आखेट से भरी कवितायेँ
-
(पंगासिनान के कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविता 'रिकिनडलड '
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