Thursday, May 16, 2013

विदेशी कलम से : सेंटिआगो विलाफानिया की कुछ कवितायेँ



सेंटिआगो की अप्रकाशित कविता संग्रह 'मुर्तामी' का मैंने हिंदी में अनुवादन किया 'प्रेमांजलि' के नाम से। प्रेमांजलि फरवरी में दिल्ली पुस्तक मेला में 2 0 1 3 में बोधि प्रकाशन द्वारा लोकार्पित की गयी|नीचे प्रस्तुत अनुवादित कवितायेँ 'प्रेमांजलि' की कुछ कविताओं में से हैं। 


सेंटिआगो विलाफानिया एक फिलीपीनी कवि हैं जो अंग्रेजी और अपनी क्षेत्रीय भाषा पंगासिनान में लिखते हैं। उन्होंने बलिकास न कोबोलॉन (२005), मागलियन (2007), पिनाब्ली एंड अदर पोएम्स ( 2012), बोंसैक वेरसेस (20  1 2) की रचना की है| विल्लाफानिया एक जाने माने फिलिपिनी कवि है और पंगासिनान साहित्य एवं कला मंडल ने इन्हें अपने सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मान 'अस्ना' से २ 0 1 0 में नवाज़ा। विलाफानिया अंग्रेजी व् पंगासिनान में लिखते हैं। इनकी रचनायें कई राष्ट्रीय व् अन्तराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

बेपरवाह 
मैं बदमाश हूँ
ढूंढो मुझे झुग्गियों में पयाटास की
या फिर लोकल ट्रेन के भीतर

दफना दो मुझे चीथड़ों में
या फिर कागज के कम्बलों में रात को
जब में स्वप्न देखता हूँ एक घर का
अपना कहने के लिए

तैरता हूँ मैं दूषित नदियों में
मनुष्यों के द्वारा गन्दी की गयी
जिनकी आत्माएं पासिंग नदी से भी काली हो गयी हैं
चलता हूँ मैं मनीला की गलियो की 
 सघन हवा में
धुआं डकारती गाड़ियों से

चट्टानों सी ऊंची 
इकठ्ठा करता हूँ गन्दगी
शहर की
शहर जो औजीयां  अस्तबलों से भी गन्दा है
बारिश के दिनों में
दिन की रौशनी में यूँ ही चलते हुए 
मालों में
देखता हूँ गनिकाएं व्यापार करती देह का
चंद पैसों के लिए

आह!
यह क्या भविष्य देखता हूँ मैं
-संतिअगो विल्लाफनिया की कविता ' फॉर अस हु ड़ू नोट केयर' से अनुवादित
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नदी का अंतिम गीत 

सुना उस रात मैंने
नदी का अंतिम गीत
नाम रहित प्रेमियों की आहें
चुरातीं एक  क्षण
जैसे अनंत काल तक|

एक मुसाफिर पक्षी का
शोक-नाद
विराम चिन्ह लगाता
रात की शांति में|

प्रतीक्षित था मैं
दिन के उठने के लिए
महसूस करता धरा की
धडकनें
और आकाश गंगा का स्पंदन|

एटलस की एक ऊँगली ने
शुरू किये कम्पन
और नदी में सुनामी के
पंख फड फडाने लगे|
मृत्यु आई निरर्थक
बिना चेतावनी के
उनकी ओर, जिन्होंने सुने
स्तोत्र
अचेतन में|

 उस रात
 मैंने सुना नदी का अंतिम गीत
 जाने वालो का शोकनाद|
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एक विद्रोही कवि के लिए
तुमने स्याही से लिखा एक कटु जीवन
कागज़ लहुलुहान हुआ, जला तुम्हारे रक्त से
और समस्त आंसु बह गए|

अपनी रिक्त आँखों से तुमने अच्छे दिनों की कामना की होगी
लड़ते हुए अदृश्य हो|

 सुना मैंने प्रेरक देवियों का रुदन
जब मृत्यु तुम्हें ले गयी सौ-सौ बार
गोलियों ने भेदा तुम्हारा मूंह
और रक्त की अंतिम बूँद रंग गयी ज़मीं
तुम्हारी आखरी कविता के साथ|

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रजनीगंधा 

तुम्हारी आँखें,
निम्न बनातीं सुबह के सूर्य को
प्रज्वल्लित है तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरे हृदय में,
तुम्हारा सौंदर्य, हक़दार एक नाम का,

पर मैं तुम्हें क्या दूं?
सिवाय एक गीत के
गीत, जो गा सके मेरे प्रेम को
विश्व के पुनर्निर्मित होने तक

ये रात शांत है, प्रेयसी
और समय जा रहा है धीरे-धीरे
ओंस से चुम्बित शाम की हवा की साँसे हल्की हो रही हैं
बेहद मीठा है यह सपना
के जागना है मुझे तुम्हारे लिए
तुम्हारा कोमल, सजीला चेहरा
हमेशा स्पर्शित मेरे प्रेम से

देखकर इसी चेहरे को
दफ़न ग़म विदा लेता है
रात की ख़ामोशी में

हमेशा याद आते हैं मुझे, तुम्हें भाने वाले
मेरे प्रेम-स्पर्श
तुम्हारी याद है मेरे साथ
मेरे कफ़न तक, प्रेयसी
-सैन्टीएगो विल्लाफानिया कविता ' अ नाईट पीस' 
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स्वदेश
 मैंने नापा है तुम्हारी सुडौलता को
कभी टकटकी बांधकर कभी एक दृष्टी से यूँ ही
हर उभार और आलेख को
चाहे वो पहाड़ हों या पठार
मैंने जीते हैं


तुम्हारे क्षितिज का परागमन किया है मैंने, एक झपक में
अधीन कर चलाता हुआ चारों दिशाओं को
चौकड़ियाँ भरता हुआ मैं तुम्हारे हरे अस्तबलों में


पार किया है मैंने तुम्हारी नदियों को
उस पुराने पशु की पीठ पर
और गाँव देवियों को तुम्हारे नाम की महत्ता और उदगम के रहस्य बताये हैं
स्मृति भरी है मेरी तुम्हारी लोक एवं पौराणिक कथाओं से
जिन्होंने मिथकीय बनाया है प्रेम प्रसंगों और जीवनियों को
तुम्हारी पीढ़ियों की, जैसे की वे हज़ारों वर्षों पहले लिखी गयी हों


स्वदेश, तुम्हारे पुनर्जागरण और स्वर्ण युग को रंगीन बनाने के लिए
और अदितीय करने के लिए ही
मैंने अब तक अपनी श्वाशों को चलायमान रखा है
ताकि, तुम्हारा इतिहास सुना जाये
मैंने मिथ्या पूर्ण व्यक्तव्य दियें हैं,
अपने ही लोगों के मध्य
जो खोते जा रहे हैं
अपनी जिव्हा का नमक
और अपनी विरासत


तुम मेरी पकड़ में हों कोबोलन (क्षेत्र पंगासिनान के रहिवासी)
मेरी कल्पना के भवन में
मेरे स्वदेश हों तुम
यहीं मेरे हृदय क्षेत्र में
जब स्वर धड़कते हैं जैसे की जंगली कबूतरों की श्वास रोक दी गयी हों
तब ये शब्द मद की भाँती बहते हैं
जैसे रक्त बहता है मेरी धमनियों में


पुनः मुझे सुनने दो बांसों से निकले वो गीत
किसी प्रेमी की श्रृंगार से भरी कवितायेँ
हाँ, पुनः सुनने हैं मुझे वे मंत्र और मंत्रध्वानियाँ
और पहाड़ों पर बैठी निस्तभता को भी
उस कालिमा में विलुप्त होंने से पहले
उस भयावह उड़ान को भरने से पहले


उठो कोबोलन और मेरे शब्दों में से बोलो
अपने शब्दों को अधरों से छु कर उन्हें पुनर्जीवित कर दो
तब तक, जब तक तुम्हारे वंशज उन्हें सुन न लें
सुनो उनके अंतर्मन की भाषा
और बोलो
मेरे विलुप्त होने से पहले


-संतिअगो विल्लाफनिया की कविता “Country of My Own” से अनुवादित
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प्रज्वलित 
 बज रहा है धानो का गीत आज रात्रि,
और समीप है आखेटक के लिए प्रजवलित चन्द्र
स्नान कर उसकी आभा में प्रदर्शित करते हुए
आदि कालीन नृत्य उस सभा का
जहाँ कृषक अर्पण करता है जो बोया था उसने धरा और रोपण की देवी को

में श्रवण करता हूँ उनकी शांत मंत्रध्वानियाँ और गीतों को
कथा कारों की अंतिम कथा
असंस्कृत आगमन के साथ
ताल में झूमते शून्य बना गतीवर्धित
में देखता हूँ उनकी प्रकाश्पुन्जित एवं जीर्ण काया
और ज्वाला जो अपनी ही श्वासों में विलुप्त हो चुकी है

ये  अधार्मिक रिवाज़, आरंभिक आवेश स्पर्श कर जाते हैं मुझे स्मृतियों में
नहीं कोमलता से नहीं
एक कवि की वाणी को जो भीतर है मेरे

यह  धनो का गीत जो बज रहा है आज रात्र
दूर नहीं है किसी कृषक के चन्द्र से
आलिंगन में बाँध लेगा ये मेरे पौरुष को
और वे सुनेंगे मुझे चीत्कारते हुए मेरी आखेट से भरी कवितायेँ
 -
(पंगासिनान के कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविता 'रिकिनडलड '





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