Titliyaan (तितलियाँ)

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Thursday, May 16, 2013

विदेशी कलम से : ऊटी मार्गरेट सेन की कुछ कवितायेँ

ऊटी मार्गरेट सेन का परिचय :ऊटी मार्गरेट सेन का जन्म नूरेमबर्ग जर्मनी में हुआ। फ्रांसीसी और स्पेनी साहित्य में येल विश्वविध्यालय से डॉक्टरेट करने के बाद वे कैलिफ़ोर्निया, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका आ गयीं।
यहाँ पर उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति को पढाया, विशेषतः स्पेनी भाषा व् साहित्य को। ऊटी ने कई लैटिन अमेरिकन देशों में वक्तव्य दिए हैं।
वे पांच भाषाओँ में कवितायेँ लिखती और अनुवादित करती हैं। वे एक साहित्यिक संपादक भी हैं और उन्होंने साहित्य पर कई आलेख लिखे हैं।
वे 'पेन क्लब काउंटी' की अध्यक्ष रह चुकी हैं और उन्होंने कैदी लेखकों के तरफ से कई पत्र दुनिया भर तक पहुंचाए हैं।

उनकी  कुछ प्रमुख रचनायें हैं: बॉडी स्केप्स, वर्ड्स ऑफ़ आर्ट, और तीन चाप बुक जिनमें प्रमुख हैं: रैंडम लाइट-स्पॉट्स ऑफ़ टाइम,
बॉडी एंड पार्ट्स,-कॉर्पो एंड प्रति, अव्क्वार्ड चाइल्ड ( उनके बचपन का युधोतर वृतांत) और फाइव सेंसेस।
ऊटी की रचनायें यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका, कई देशों में और इन्टरनेट पर प्रकाशित हो चुकी हैं।
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साथ 
(जॉर्ज सैमुएल के पारस्परिक प्रभाव के सिद्धांत की सहमति में)
रहो साथ मेरे
छेड़ हो या खारिश
खुशबू या ज़ायका
ख़ुशी हो या ग़म
भूख हो या प्यास
बांटो साथ मेरे
दुःख की ख़ुशी
ख़ुशी का  दर्द
और मिली जुली मदहोशी
साथ रहो इन सब में
यही है ज़िन्दगी |

नदी के समीप देमोस्थानीज़ 
समीप नदी के,
देमोस्थनीज| 
लोग सोचते हैं 
सीखा है उसने यहाँ चिल्लाना
मुह में पत्थर होते हुए भी


सागर चिल्ला रहा है
और चिल्ला रहे हैं अथेन्स वासी
एरोपैज में 
विशाल है सागर इतना
के भूल जाता है
देमोस्थनीज 
विषय में अपने
मनाता है वो सागर को
अपनी चर्चा में

सागर संसार है
प्रकृति है सागर
गूँज है यह मानव वाणियों की |
सागर है
ताकि लोग सुन सकें गूँज मानवता की
किसी को तो उन्हें मनाना होगा
बिना चीखे
एरोपैज में|


नदी के तट पर   (Translated from ‘Morning in Long Beach’)
एक गिलहरी आनंदित
दौड़ती तेज़ दूसरी से
और खेलतीं दोनों
अपना असभ्य खेल |

पांच गौरियां बैठीं मेज़ के नीचे
मारती चोंच धुल पर |

एक समुद्री पक्षी
अचानक गोते खाता
तरंग लेते पानी में |

चार श्याम पक्षी कालिमा लिए पंखों में
कूदते
लड़खड़ाते एक मित्र के साथ |

बगुला एक झांकता
खड़ा स्त्भ्ध
पानी में झांकता |

और समय उड़ता हुआ |


असज्जित  (Translated from ‘Nude Woman Shoulder View’)
(‘Dreams from a School of Chance’ की शीर्षक कविता)
जादू भरा क्षण वो
देखता एक चित्रकार
चित्रित करने के लिए
प्रशंसा भरी आँखों से
देवी सी
माँ को अपनी
लिए है जो दैहिक प्रचुरता |

कल्पना करते हम उस माँ की
भावना भर आनंद से
बार बार मुडती जो बात करने के लिए बेटे से
चित्रित कंधे पर अपने |

जादुई क्षण
एक अदितीय मनोहरता
प्रकाश की किरण
आर- पार होतीं
हमारे मानव जीवनों से|


नेपल्स के एक महल में  (Translated from On a Window at Capidomonte Palace, Nepales)
सामग्रियां सभी हैं यहाँ कैनवास की
काढ़ा जाये
रंग जाये
जिसपर
एक सुरम्य भूदृश्य
बादलों सहित |

एक पेड़ हो जिसमें
बंधा जड़ों से
भूमि पर प्रकाश ले
जो देता हो रंगों को |


मेरे गीत  (Translated from ‘New Song of Songs’)
एक खूबसूरत फुसफुसाहट के साथ
जीवन में आये तुम
कानों के भीतर कांपती आवाजों-से
पक्षियों के गीत-से
बुलबुले बनाते झरने के पानी-से

सुरम्य सोम्य सागर की आवाज़-से
बांधता है जो धरती को प्रेम सहित |
प्रेम
जैसा मेरा है तुम्हारे लिए |


प्रेम गीत अधरों पर  (Translated from ‘Love Word on My Lips’)
 प्रेम रोया
मेरे अधरों पर
चुम्बित किया तुमने इसे जागते हुए |

रहो तुम सदैव आकाश से
एक पृथ्वी और कई तारों से
मैं स्वामित्व करती तुम्हारा |

रोशनियाँ पानी में
पुलों के नीचे हिलते बादल
जैसे तुम्हारी आंखें हो हिलतीं भीतर मेरे |

खोलो सागर, खोलो
अपनी आँखें, चौड़ी खिड़कियाँ और दरवाज़े
जब तक तैर न लें हम रौशनी में |
रोतीं हैं आँखें, सिसकती है आवाज़
तैरते हैं हम जैसे ही एक दूसरे के पानी में |

जागती रातों में
तैरते हम तारों ओर मछलियों सहित
प्रकाश की ओर सुबह के
सपनों की उदासी में
सागर, हवा, सूर्य, बादल
देखते हमारा चुम्बन|

लो श्रृंगार  (Translated from ‘Arts Poetico- Erotica’)
(तुम्हारी देह सुन्दरता से भरा एक भूदृश्य………………)
लो यह मार्ग भौतिक सुख के लिए 
पकड़ में ले इसका भटका हुआ विस्तार और धेय्य
इसका बेबाकी से बना पुराना तत्त्व 
इसके मानचित्र को
पकड़ो मेरी देह पर 
बनो मेरे जैसे मैं हूँ तुम्हारी |

तुम्हें मिलेगा एक रिक्त, स्वच्छ स्थान,
भीतर उसके 
एक गुलाब का बगीचा, एक धरती 
एक पर्वत और समुद्र भी 
कटि से होता हुआ
गुप्त और बंद 
सत्य नामक उपद्रवी पशु का |

खोजो तुम क्रीडामय भूगोल वहां 
ढका  है जो रोषपूर्ण कोलाहल से 
कभी कभी द्वेष भरे भटकाव से 
पर गुप्त भली भांति |
करो प्रदर्शित बाध्य छिपा संगीत
रास्ता है यहाँ से 
एकदा वर्जित मूल की ओर
आवरण एक सोम्य मुक्त स्थान का |

हमारी सांसे इकठ्ठा करतीं रेतीली देहों को 
तैरती जो  अंतिम अपराजित तट की ओर
बहती रेत इकठ्ठा होती मिट्टी के ढेर में 
यह शब्द हमारा संसार हैं 
जहाँ मैं हूँ, तुम हो 
मूल रूप से 

कितना परिपूर्ण है होना तुम्हारे साथ यहाँ 
दो प्रेम स्पर्शित मछलियों-से हम 
सुरमई नीले रंग के अब

लेती हुई मैं अपना बृहत मानचित्रित संसार 
जो सदैव मेरा था 
मूल रूप से मेरा|


तत्त्व फ्लोरिडा के (हायकू)  (Elements of Florida, ‘Haiku’)
 शरीर पानी के
बहते बादलों के साथ प्लेसिड के
भेदते एक दुसरे को  |

तत्त्व
पानी और पारदर्शी हवा
बनती रौशनी और झाग |


बहता पानी
खोजता विश्राम
और समानता |

नावें हिलतीं पानी से 
नदी निस्थापित करती उसे
एक सोम्य संतुलन से |

खेल, सोम्य स्पर्श
हमारी देह उद्गमित करती
शांत होने पर मस्तिस्क के|


पुस्तक-
एक कला
एक विचार जन्मित
पंखों सहित, तैयार उड़ान के लिए|


लागूना तट (हायकू) (Laguna Beach ‘Haiku)
सफ़ेद और सलेटी
सूर्या की झुकी किरण
हिलती गीली रेत पर

सफ़ेद गोटा फुहार का
हिलता मेजपोश-सा
धरती और समुद्र के बीच

हम कभी जान पाएंगे नहीं
के मछली समुद्र से सुगन्धित है
या समुद्र मछली से



कई क्रीडाओं से अधिक
देता है आराम
खेल मृत्यु का रेत पर


तस्वीर  ( Self Portrait)
 बैठी वह, लिखती
टनों हायकू
पासपोर्ट पर अपने  |

रेत- पुराने प्रेमी सी
कहीं सोम्य
कठोर कहीं |

कूटी गयी टुकड़ों में
रेत-विशाल देह
देती आश्रय मुझे |

रेत
कांपती जैसे दो देहें
प्राचीन खेल के पश्चात् |

तुम करते हो अब मुझे अस्वीकार
करते थे तब प्रेम मेरे दिमाग से
बिना प्रश्न किये |

सूर्य-लाल और भयावह
जलता मेरी पलकों तले
एक भूले, खोये प्रेम की भांति|

मैं बंद करतीं पलकें
सूर्यास्त होता अपराह्न में
तुम्हारे चेहरे का |

नीले द्वीप
धरती और समुद्र के विपरीत
जलाते मेरी पलकें |


नीली आँखें
लाल अब मेरी पलकों तले
खोजतीं प्रेम |

दहाड़ती नदी
सोम्य भी
दो बजे लिए शांत आकाश |

नदी की हवाएं , सांस लेतीं
सांस में बाँट ती जो कई पक्षियों के साथ
सिले हैं जो आकाश से  |

धरती का दर्पण
नदी का पिघला हिस्सा
बोलता एक घर के लिए

नदी की दहाड़
भेदती मेरा शरीर
एक गूँज सहित |

अप्रैल की दोपहर  (April Afternoon)
मुस्कुराती सूरज  की किरणें
शानदार पेड़ की शाख पर
और मैं इस ख़ूबसूरती के बीच |

पत्तियाँ झूलती हवा में
पड़ती पेड़ पर रौशनी
यह जीवन, मोअत्तिल  आज
नर्म हवा से
एक तोहफे सा, एक पल में
ज़िन्दगी बनीं मोहब्बत आज |

सबूत और सोच तुम्हारी
मेरा ध्यान
मेरा अमल
हिलता पत्तियों का गुच्छा
अदृश्य ख़ूबसूरती
हवा करती स्पर्श रौशनी को |

यही पल है जब दोपहर मंडराती है
और हवा पंछियों के चारों ओर घूमती है

पत्तियां सरसरातीं, अलग होतीं
और रौशनी डूबती क्षितिज की ओर
सोम्य परछाइयाँ फैलतीं
शाम को
मिर्च के पत्ते
बुने गोटे से लगते
और तुम मन में मेरे हो टहेलते |



Posted by तितलियाँ (Titliyaan) at 5:15 AM
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