Monday, May 20, 2013

मेरी कलम से

उनके लिए जो दर्द गाते हैं 




 (जगजीत जी की याद में )
जैसे इंतज़ार में सफ़ेद-सलेटी
परिंदे
 प्यार के दानों के
वैसे ही
 बिछ जाते थे लोग
कालीनों पर
महफ़िल में तुम्हारी


तुम्हारी उँगलियों से शुरू होती ग़ज़ल
जब आती थी होंठों तक
लोग सूफी हो जाते थे  
किसी सुदूर पहाड़ के नॉन कमर्शियल मंदिर सा एहसास
सा तुम्हारी महफिलों में
विजया 


जैसे रिसता है प्रेम धीरे-धीरे दिल में
और फिर दिल ही सोख लेता है उसे आहिस्ता आहिस्ता
वैसे ही सुरों को चूम लेती थीं तुम्हारी सुगन्धित धूप  सी आवाज़
चुटकी में हवा होती खुशियाँ नहीं
दर्द गाते तुम
सुरों और ग़ज़लों में पिरोया दर्द
कैसे सीता था ज़ख्म सुनने वालों के ?


तुम्हारे होंठों पर चढ़े सुर का स्वाद
हर जुबां लेती है
लोग बह जाते हैं
तुम्हारी ग़ज़लों की बे साहिल नदियों में
जैसे रात बहती है तनहा सी
शायद यही है मतलब संगीत का
तुम्हारा नाम
शायद तुम्हें ही ग़ज़ल कहते हैं
आज तुम जा चुके हो
पर यादों की गीली मिटटी में
तुम्हारी यादों के गुलाब
महकेंगे हमेशा|









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