Wednesday, May 15, 2013

विदेशी कलम से: अशोक भार्गव की अनुवादित कविताओं में से कुछ





 मूल रूप से भारतीय अशोक भार्गव कई सालों से वैंगकूवर कनाडा में रह रहे है। कनाडा के प्रसिद्द कवि होने के साथ साथ वे 'रायटर्स इंटरनेशनल नेटवर्क' वैंगकूवर कनाडा के अध्यक्ष भी हैं। अशोक अंग्रेजी में लिखते हैं। उनकी प्रमुख रचनायें हैं: 'हाफ ओपन डोर', 'स्किप्पिंग स्टोंस', 'मिरर ऑफ़ ड्रीम्स', 'कर्नेल ऑफ़ ट्रुथ' और 'लॉस्ट इन मोर्निंग कॉम'। 

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प्रतीक 

अपराह का सूर्य 
एक अग्नि पिंड स्पर्श करता
क्षितिज को
गिरिजा के भीतर गायी जा रहीं स्तुतियाँ 
पूर्ति करती वायु का सूक्तियों से 
पथ खोजतीं घर का

एक बाड़ा विभाजित करता 
पादरी के मंच से श्रोताओं को
जो की ज्ञानमय हैं 
बदलते हुए प्रकाश से
जो निथर कर आ रहा है 
धब्बेदार कांच से

सृजन करती गिरती हुई ईशु की प्रतिमा का
क्रूश से गिरी और बड़े में अटकी हुई

जागृत करो देवों को 
पोछो मवाद
बनाओ स्थान निराश्रय, निर्धन 
एवं अन्य लोकिक विदेशियों के लिए
क्यूंकि यह एक प्रतीक है
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता ' ए साइन' से अनुवादित 
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चैतन्य
श्चिम की ओर दृष्टिगोचर
मरीन डॉइव  पर
खुले हुए हस्त समर्थित करते हुए
बृहत लबादे को-तुम वहीँ खड़े हो हे चैतन्य
क्षितिज पर दृष्टि रखे हुए
अविचलित
प्रतीक्षित
भविष्यवाणी करते हुए एक नवीनतम घटना के आगमन की 
यहाँ घुमावदार नदियों के तट नहीं 
न ही अस्थिर बंगाल के बाघ 
न ही है यहाँ वर्षा का जल है जो तुम्हारे पाँव पखार सके
मात्र श्वेत हिम है, अतिशीत करने के लिए तुम्हारे प्राणों को

कालिमा में वर्षा की बूंदे
अनुकरण  करतीं जुगनुओं का
पूर्ण करतीं रिक्तता को
प्रदर्शित करते हुए एक पाषाण ह्रदय 
धडकनों से वर्जित
क्या तुम देख सकते हो चैतन्य 
अपने मार्ग की दुर्गमता को
मुझे लगता है तुम जानते हो
विशाल 
जो में व्यक्त कर रहा हूँ

क पाषाण धर्मादेश
एक नवीन नास्तिकता
अपारदर्शी पर स्पष्ट
साधारण पर जटिल
उथला पर गहरा, लेन-देन
हल्का या गाड़ा, दुःख या प्रसन्नता
मतभेद या उड़ान
एक मात्र कोशिका
से लेकर पृथ्वी के ढेर तक
है जीवन यात्रा

हे चैतन्य उठो
तुम्हारी पाषाण मुस्कराहट असमंजित है
अनुपयुक्त   
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता 'चैतन्य' से अनुवादित 
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सौम्य स्पर्श 

यदि तुम्हें मुझसे प्रेम करने की अभिलाषा है
तो मुझे स्वीकार करो
यदि तुम मुझपर विश्वास करना चाहती हो 
तो करो, बिना किसी तर्क के
 यदि तुम मुझे प्रेम-स्पर्श देना चाहती हो 
तो स्पर्श करो मुझे अपने नेत्रों से 
बिना प्रश्न किये
क्यूंकि
एक दिन मेरा प्रेम प्रकट होगा 
मेरा आवेग उभरेगा
मेरा हृदय समृद्ध हो जायेगा
मेरा उत्साह बढेगा तुम्हारे लिए
परन्तु
यदि तुम नहीं कर सकतीं मेरी प्रतीक्षा
तो बिना दुविधा 
मुझसे विदा लो
क्यूंकि जब भी में इच्छुक रहूँगा 
सृजन कर सकता हूँ तुम्हारा  
-अशोक भार्गव की कविता ' सोफ्ट टच' से अनुवादित 
        
मै और तुम 

 जैसे छोटी नदियों का  समावेश होता है  बड़ी नदियों में
और बड़ी नदियों का सागर में
जैसे वायु  का समावेश होता है पुष्पों की सुगंध में
और पुष्पों का प्रेमियों में 
प्रकृति की हर वस्तु का समावेश होता है एक दूसरे में
तो मेरा और तुम्हारा क्यूँ नहीं?
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता 'यू एंड मी' से अनुवादित
 
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सन्यासी 

शांतिपूर्वक
हर दिन
वह गतिबद्ध होता है 
नगर के भवन समूह की ओर  
आगे और पीछे 
प्रातः से संध्या 
इस वक्र से उस वक्र तक 

एक व्यक्ति की खोज में
जो उसके मन का अध्ययन कर सके
अपने हृदय की वाणी से
क्यूंकि 
न्यून भी बहुतेरा है
जब आत्मा और देह एक हों
क्यूंकि
तुम पुनः पाओगे जो भी प्रदान करोगे
और वो जो दान नहीं किया विलुप्त हो जायेगा
-अशोक भार्गव की कविता 'हेर्मिट' से अनुवादित    
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प्रतीक 

अपराह का सूर्य 
एक अग्नि पिंड स्पर्श करता
क्षितिज को
गिरिजा के भीतर गयी जा रहीं स्तुतियाँ 
पूर्ति करती वायु का सूक्तियों से 
पथ खोजतीं घर का

एक बाड़ा विभाजित करता 
पादरी के मंच से श्रोताओं को
जो की ज्ञानमय हैं 
बदलते हुए प्रकाश से
जो निथर कर आ रहा है 
धब्बेदार कांच से

सृजन करती गिरती हुई ईशु की प्रतिमा का
क्रूश से गिरी और बड़े में अटकी हुई

जागृत करो देवों को 
पोछो मवाद
बनाओ स्थान निराश्रय, निर्धन 
एवं अन्य लोकिक विदेशियों के लिए
क्यूंकि यह एक प्रतीक है
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता ' ए साइन' से अनुवादित 
 

मिट्टी का पैगम्बर 

एक बार मैंने सौंदा उत्तम मृदा को सुगन्धित सौम्य देह में
मैंने उसके कर्ण, नाक, अधर और कपोल बनाये
बनाया उसे एक रमणीय खिलौना
मैंने उसे चमकीला ललाट और केश दिए
उसे अपनी धमनियां और रक्त दिया 
सामर्थ्य दिया अपने अंगों का
और हृदय भी 
मैंने उसे अपने नेत्र दिए 
उसके फेफणों को अपनी श्वांसों से भरा 
उसपर अर्पण किया सर्वस्व, प्राण भी
जब भी वह बोला, हंसा, चला 
बना वह मेरा रक्षक, पैगम्बर, गुरु और मसीहा 
क्रमशः लोगों ने उसे देखा 
पसंद किया, प्रेम किया उससे और अर्चना की उसकी
इस प्रकार वह अंतर्लीन हो गया उनके प्रेम में 
मुझे किया निर्जन
एवं निराश

कई वर्षों पश्चात् पुनः लौटा वह 
और आग्रह किया बनने का इश्वर मेरा 
मैंने उससे कहा 
अब वह मेरा रक्षक नहीं
जब वह था, ईशु, कृष्ण और मोहम्मद कहलाता था
वह चमत्कार करता था और नेत्रहीनों को देख पाने का सामर्थ्य देता था 
पर्वत उठा लेता था वह अपनी कनिष्ठिका पर
और छत्र की तरह प्रयोग कर वर्षा के प्रकोप से 
लोगों का कवच बनाता था 

जब वह मेरा पैगम्बर था 
हरक्युलिस से प्रभावशाली था 
और उसका मुख लाखों सूर्यों, चंद्रों और नक्षत्रों की भांति प्रकाश्पुन्जित था 
उस समय मात्र उसका नाम पर्याप्त था 
मेरे दुखों को अवांछित करने के लिए 
मैंने उससे कहां
जब वह मेरा फ़रिश्ता था 
उसके चरणों के मात्र स्पर्श ने
परिवर्तित कर दिया था, विशाल गंगा के जल को अमृत में
जिससे अतृप्त आत्मा मेरी जीवंत हो उठती 
मैंने कहा उससे
हाँ, उस समय में इच्छित था उसके साथ का
 नैकट्य का
पर अब मुझे आवश्यकता नहीं
क्यूंकि में परिचित हो चूका हूँ 
अपने यथार्थ से
सत्य से
और अहम से 
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता 'क्ले प्रोफेट' से अनुवादित

 

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